Also Available in:

यीशु क्यों मरा?

सृष्टि और बलिदान पद्धति

द्वारा

Three crosses of Golgotha

मेरे लेख “एक इवैन्जेलिकल ‘लिटमस टेस्ट’” अर्थात् सत्य की सुसमाचारवादी परीक्षा में मैंने “सुसमाचारवाद” शब्द के प्रभाव के कमजोर होने की बात की थी। “लिटमस टेस्ट” में मैंने एक सच्चे सुसमाचारवादी होने का चिन्ह उसके द्वारा उत्पत्ति 1-11 के सीधे पठन को स्वीकृत किए जाने के चिन्ह के रूप में सुझाव दिया था क्योंकि उत्पत्ति 1-11 के ऊपर आक्रमण मूल रूप से बाइबल के अधिकार के ऊपर, और परिणामस्वरूप परमेश्‍वर के ऊपर आक्रमण करना है।1

इन दिनों में स्वयं को इवैन्जेलिकल अर्थात् सुसमाचारवादी बुलाए जाने वाले लोग इस तरह के एक कथन के ऊपर विवाद, यह दावा करते हुए करेंगे कि सृष्टि-बनाम-क्रमिक विकास का विषय उनके विश्‍वास के लिए “प्रासंगिक नहीं” है या यह कि सृष्टि के वृतान्त की विभिन्न तरीकों से व्याख्या की जा सकती है। परन्तु, मेरा तर्क यह है कि दोनों ही दृष्टिकोण ऐसी प्रमुख धर्मवैज्ञानिक समस्याओं को उत्पन्न करते हैं जो सुसमाचार को उसकी नींव से ही हिला देता है।

यहाँ पर, मैं सृष्टि-बनाम-क्रमिक विकास के विज्ञान के ऊपर शोध नहीं करूँगा क्योंकि इसे कहीं और विचार किया जाएगा, अपितु उन धर्मवैज्ञानिक विषयों के ऊपर विचार विमर्श करूँगा जो एक ऐसे प्रश्‍न के चारों ओर घुमते हैं जिसे मैंने अपने पिछले लेख में छोड़ दिया था अर्थात्, “यीशु क्यों मरा?”

कोई भी ईमानदार इवैन्जेलिकल अर्थात् सुसमाचारवादी ऐसा सुझाव नहीं देगा कि ख्रिष्टविज्ञान (मसीह के बारे में अध्ययन) “प्रासंगिक नहीं” है और मिलॉर्ड एरिक्सन कहते हैं कि मसीह के बारे में हमारी समझ मसीही विश्‍वास के चरित्र के लिए केन्द्रीय और निर्धारक होनी चाहिए। मसीह के बारे में जो कुछ एक व्यक्ति सोचता है, के प्रश्‍न को लेकर सब कुछ बाद की बातें हैं।”2तौभी, “विज्ञान” और “ख्रिष्टविज्ञान” के द्वारा बहुत सा धर्मविज्ञान प्रभावित हुआ है, विशेषकर, इसने ऐसे विषयों की उपेक्षा की है जैसे लूका यीशु की वंशावली को आदम से आते हुए पाता है और पौलुस कहता है कि मृत्यु इस संसार में केवल आदम के पाप करने के कारण से आई।

ख्रिष्टविज्ञान अपने स्वयं के अधिकार में एक बहुत ही विस्तृत विषय है और समय की कमी इसके अधिक वर्णन किए जाने के लिए बाधा डालता है। इतना ही कहना ठीक रहेगा कि यीशु को कैसे देखा जाए के लिए यहाँ पर ऐसे दो ही दृष्टिकोण हैं, अर्थात् मनुष्य के दृष्टिकोण से (“नीचे की ओर से” दिया हुआ ख्रिष्टविज्ञान) या परमेश्‍वर के दृष्टिकोण से (“ऊपर की ओर से” दिया हुआ ख्रिष्टविज्ञान)। पहला दृष्टिकोण, यद्यपि अपनी तकनीकी में, धर्मवैज्ञानिक रूप से वैध है, यह उदारवादी विद्वानों के अधीन होने की प्रवृत्ति रखता है, जो सटीकता के प्रश्‍न को करते हैं, और यहाँ तक कि बाइबल के अधिकार की सटीकता का। ऊपर की ओर से दिया हुआ ख्रिष्टविज्ञान इस दृष्टिकोण कि बाइबल परमेश्‍वर का प्रेरित वचन है, के निहित स्वीकरण के विचार के इवैन्जेलिकल अर्थात् सुसमाचारवादी दृष्टिकोण से अधिक मेल खाता है और इसलिए मैं यहाँ पर अपने ध्यान को इस दृष्टिकोण और इसके निहितार्थों की ओर केन्द्रित करूँगा।

यदि हम सुसमाचारों में इस सुझाव कि परमेश्‍वर किन बातों के महत्वपूर्ण होने को देखता है, को पाने के लिए “वचनों की गणना” करें तो प्राथमिक महत्ता स्पष्ट रूप से क्रूस है। यीशु के पहिनावे, उसकी पसन्दों, नापसन्दों इत्यादि जैसी बातों की कोई प्रत्यक्ष सूचना नहीं है। यहाँ तक कि दो सुसमाचार उसके जन्म के विवरण को ही छोड़ देते हैं। इसके विपरीत, सुसमाचारों के आधे से अधिक अध्याय उसके जीवन के अन्तिम सप्ताह और इस तक पहुँचने वाली तत्कालिक या उसके क्रूसीकरण के पश्चात् की घटनाओं के लिए समर्पित हैं।

सृष्टि-बनाम-क्रमिक विकास का वाद-विवाद अक्सर वैज्ञानिक तर्कों के ऊपर लड़ा जाता है, परन्तु ख्रिष्टविज्ञान के विषय के ऊपर सृष्टि के वृतान्त के प्रभाव के बारे में क्या कहा जाए, और विशेषकर, यीशु की मृत्यु के ऊपर? विशेष रूप से तीन विषय हैं जिनकी सावधानीपूर्वक जाँच किए जाने की आवश्यकता है:

  • मृत्यु क्या है?
  • यीशु को क्यों मरना पड़ा?
  • हमारे लिए मरने के लिए उसे कौन सी “योग्यताओं” को पूरा करने की आवश्यकता पड़ी?

ये तीनों ही विषय मुख्य हैं और इसलिए महत्वपूर्णता के कारण, निम्न तर्कों को संक्षेप में इस आशा के साथ दिया गया है कि यह दोनों अर्थात् अपनी महत्वपूर्णता और प्रासंगिकता को सृष्टि के वृतान्त को दिखाने के लिए पर्याप्त है।

दोनों अर्थात् ईश्‍वरवादी और मानवादी विकासवादियों के अनुसार, मृत्यु और दुख, मनुष्य के क्रमिक विकास में आने से या रचे जाने से हज़ारों, या यहाँ तक कि लाखों वर्षों पहले किसी ऐसी प्रक्रिया के द्वारा प्रगट हो गया था जिसे बाइबल में छोड़ दिया गया है। तथापि, मृत्यु क्या है और इसका उद्गम कैसे हुआ?

दोनों अर्थात् उत्पत्ति और नया नियम (रोमियों 5:12) कहते हैं कि मृत्यु इस संसार में एक व्यक्ति के पाप के कारण, इस स्पष्ट निहितार्थ के साथ प्रवेश हुई कि आदम से पहले कोई मृत्यु नहीं थी। इसलिए हम क्यों उसे अन्देखा कर देते हैं जिसके लिए दोनों नियम बोलते हैं और क्रमिक विकासवादी कल्पना कि मृत्यु “स्वाभाविक” है, को ऐसे ही स्वीकार कर लेते हैं?

यह बात बहुत ही रूचिपूर्ण है, कि क्रमिक विकासवादी मृत्यु को प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार किए जाने पर बहुत ही प्रसन्न होते हैं, और फिर भी अक्सर जिसे “पुराने नियम का परमेश्‍वर” कह कर पुकारा जाता है, उस पर पशुओं के प्रति और इसके पश्चात् यीशु के लहू का हमारे बदले में बहाए जाने के लिए उसके ऊपर निर्दयी होने का दोष लगाते हैं। यद्यपि, वास्तविकता यह है कि – बाइबल के अनुसार - सभी के जीवन के लेखक और सृष्टिकर्ता के पास उस जीवन को हटाने का “अधिकार” (आधुनिक शब्दावली का उपयोग करते हुए) है। जब अन्त में कोई उस कार्य को करता है जिसे परमेश्‍वर ने किया है और जीवन को शून्य में से रचता है, केवल तब ही उसे इसके ऊपर नैतिक अधिकार है, तब ही उसके पास व्यवस्था को देने के लिए अधिकार है कि उस नए जीवन के साथ क्या कुछ घटित होना चाहिए!

सच्चाई तो यह है, कि बाइबल में पहली वर्णित (या निहितार्थ) मृत्यु तब दिखाई देती है जब परमेश्‍वर ने एक पशु (एक मेम्ने?) को आदम और हव्वा को ढकने के लिए चमड़े का प्रबन्ध करने के लिए मारा था। इस कार्य के द्वारा, परमेश्‍वर ने बलिदान पद्धति को आरम्भ किया जो पाप को ढकने के लिए लहू के उण्डेले जाने की मांग को करती है, यह ऐसी पद्धति है जिसने तब इस बात को कैन और हाबिल की उत्पत्ति 4 में वर्णित कथा में इसका उल्लेख स्पष्ट रूप से किया। इसके अतिरिक्त, उत्पत्ति 3:15 में शैतान को मसीह के द्वारा कुचलने का प्रथम संकेत मिलता है। इस तरह से, वहाँ उत्पत्ति 4 तक, पाप, मृत्यु और बलिदान पद्धति को मसीह के आगमन के संदर्भ में बलिदान पद्धति के साथ आपस में जुड़े हुए होने और उसके द्वारा मरने की आवश्यकता के लिए, बलिदान पद्धति के साथ आपस में जुड़े हुए होने को पाते हैं।

अब अधिकांश इवैन्जेलिकल अर्थात् सुसमाचारवादी इस बात से सहमत होंगे कि यीशु मसीह को मरना था, और साथ ही उसे: क) मानव; ख) ईश्‍वरीय; ग) पुरूष; घ) पहिलौठा; और च) बिना किसी धब्बे के सिद्ध होना था। परन्तु क्यों? हम कहाँ पर इन शर्तों को स्थापित करते हैं? उच्च कोटि के सुसमाचारवादी धर्मवैज्ञानिक लेख शीघ्रता से यीशु की मानवता और ईश्‍वरत्व को दर्शाने के लिए वचनों को प्रदान करेंगे, परन्तु बाद की सभी तीन शर्तें बलिदान पद्धति का अंग हैं।

“यदि उत्पत्ति 1-4 तक के सीधे पठन को हटा दिया जाए, तब बलिदान पद्धति के लिए न केवल कोई स्पष्टीकरण या औचित्य रह जाता है…अपितु यीशु के मरने के लिए भी कोई वैध, बाइबल आधारित स्पष्टीकरण नहीं रह जाता है।” यद्यपि बलिदान पद्धति “आरम्भ” से ही अस्तित्व में थी, परन्तु यह हमें तब तक नहीं मिलती जब तक मूसा ने इसे संहिताबद्ध नहीं कर लिया था और इसी के साथ वह उन “योग्यताओं” को जोड़ देता है जिन्हें यीशु को हमारे लिए मरने के लिए पूर्णता के लिए सक्षम होना था, जिसने शर्तों की एक विशेष सूची का प्रबन्ध कर दिया गया। तथापि, यदि उत्पत्ति 1-4 तक के सीधा पठन को हटा दिया जाए, तब बलिदान पद्धति के लिए न केवल कोई स्पष्टीकरण या औचित्य रह जाता है (जिसमें, बहुत से बाइबल आधारित और जल प्रलय जैसे विषय सम्मिलित हैं, जो लगभग विश्‍वव्यापी रूप से पाए जाते हैं), अपितु क्यों यीशु को मरना पड़ा के लिए भी कोई वैध, बाइबल आधारित स्पष्टीकरण नहीं रह जाता है।

इस तरह से, यीशु कैसे उसके आने से 1,500 वर्षों पहले निर्धारित की हुई “योग्यता” की शर्तों को पूरा करने में खरा उतरता है?नए नियम में, हम पाते हैं कि यीशु पुरूष और पहिलौठा था (उदा. लूका 2:2), वह पिता के द्वारा पवित्रात्मा की ओर से कुँवारी से (लूका 1:26-38) मीरास में मिलने वाले पाप की श्रृंखला को तोड़ते हुए उत्पन्न हुआ और यह कि वह धब्बेरहित (कुलुस्सियों 1:22; 1 पतरस 1:19) था। वह साथ ही मानव और ईश्‍वरीय था, परिणामस्वरूप हमारे पास एक पूर्ण ईश्‍वरीय मानव का मेल है!

तथापि, यही वह स्थान है जहाँ पर सृष्टि-बनाम-क्रमिक विकासवाद, और इस से सम्बद्ध पृथ्वी की लम्बी आयु का विषय “अप्रासंगिक” होते हुए समाप्त हो जाता है, परन्तु ये बड़ी दृढ़ता से बाइबल के अधिकार, ख्रिष्टविज्ञान और अन्त में, हमारे स्वयं के छुटकारे के साथ जुड़े हुए हैं।

यह सुझाव देना सरल है, कि आदम और हव्वा (और पाप और मृत्यु के सम्बद्ध विषयों) का वृतान्त एक मिथक कथा है, या इसकी “पुनर्व्याख्या” की जाने आवश्यकता है, यह दोनों ही बातें परमेश्‍वर और पवित्रशास्त्र के अधिकार के ऊपर परोक्ष आक्रमण करना है और साथ ही यीशु की मृत्यु के सम्पूर्ण उद्देश्य के ऊपर ही प्रश्‍न खड़ा कर देना है। यह दोनों अर्थात् पुराने और नए नियम के ऊपर आक्रमण करना है क्योंकि लूका यीशु की वंशावली को आदम (लूका 3:23-38) से होना उद्धृत करता है, पौलुस यीशु को “अन्तिम आदम” (1 कुरिन्थियों 15:45) के रूप में संदर्भित करता है और आदम के लिए नए नियम के और भी अधिक संदर्भ (1 तीमुथियुस 2:13-14; यहूदा 1:14) पाए जाते हैं। पाप, और इसके साथ मृत्यु का परिचय, नए नियम में आदम के साथ में भी जुड़ा हुआ है (रोमियों 5:12)। इसलिए, यदि आदम एक भौतिक, ऐतिहासिक प्राणी नहीं है, तब अपने प्रभाव में बाइबल की किसी भी बात को अर्थ पूर्ण रूप में नहीं लिया जा सकता है, जो एक ऐसा तथ्य है जिसकी ऐसा जान पड़ता है कि नास्तिक कई सुसमाचारवादियों से कहीं अधिक सराहना करते हैं! इससे भी दुर्भाग्य की बात है, कि यीशु का हमारे लिए मरने के लिए आने, और इसी के साथ हमारे छुटकारे का भी पूर्ण औचित्य ही व्यर्थ हो जाता है।

“यह न केवल उत्पत्ति 1:2 से पहले के पृथ्वी की लम्बी आयु होने को – अपितु साथ ही इसके किस उद्देश्य के होने के लिए, को भी पीछे छोड़ देता है? यदि हमें आदम की सृष्टि के आगे से बाइबल को स्वीकार करना है, तब हम क्यों बाकी के बचे हुए कुछ वचनों के साथ परमेश्‍वर के बारे में प्रश्‍न करेंगे?”

परन्तु परमेश्‍वर ने फिर भी क्रमिक विकास का उपयोग किया है और पृथ्वी की लम्बी आयु होने के बारे में क्या कहा जाए?

यदि आदम और हव्वा ऐतिहासिक प्राणी हैं, तब स्पष्ट रूप से उस बिन्दु से क्रमिक विकास की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है जैसा कि लूका में यीशु की वंशावली के द्वारा प्रमाणित किया हुआ है। इसके अतिरिक्त, यदि आदम के आने से पूर्व मृत्यु नहीं थी (रोमियों 5:12), तब क्रमिक विकास का कोई स्थान नहीं रह जाता - इसे पूरी तरह से अस्वीकार किया जाता है।

यह केवल उत्पत्ति 1:2 से पहले की पृथ्वी के लम्बी आयु के होने को छोड़ देता है – परन्तु किस उद्देश्य के लिए? यदि हमें आदम की सृष्टि के आगे से बाइबल को स्वीकार करना है, तब हम क्यों बाकी के बचे हुए कुछ वचनों के साथ परमेश्‍वर के बारे में प्रश्‍न करेंगे? क्यों कोई उत्पत्ति 1:1 और 2 के मध्य के “अन्तराल” को पाटना चाहेगा, या फिर उत्पत्ति के दिनों को “परमेश्‍वर, न कि मनुष्य के दिनों के रूप में” या फिर किसी अन्य “स्पष्टीकरण” के रूप में उत्पत्ति के सीधे पठन का इन्कार करते हुए देखना चाहेगा? इसका केवल एक ही कारण एक गैर-बाइबल आधारित, गैर-अलौकिक, मानवीय दृष्टिकोण को किसी एक व्यक्ति के धर्मविज्ञान में शुद्ध रूप से स्वीकार करना है, जो क्रमिक विकास को कार्य करने के लिए पृथ्वी की लम्बी आयु के होने की मांग करता हो!

बाइबल शिक्षा देती है कि यीशु मसीह अन्तिम आदम (1 कुरिन्थियों 15:45) है जो हमारे पापों के लिए मरने आया और क्रूस के ऊपर मरने के द्वारा, उसने परमेश्‍वर के साथ हमारे मेल मिलाप के तरीके का प्रबन्ध और हमें उसके साथ अनन्तकाल को व्यतीत किए जाने के लिए सक्षम किया है। जैसा कि पौलुस गलातियों 1:6-7 में कहता है इसे छोड़ कोई भी “सुसमाचार” वास्तव में सुसमाचार है ही नहीं!

संदर्भ

  1. इस लेख को ब्रिक़, आर., यीशु क्यों मरा? - सृष्टि और बलिदान पद्धति, सॉल्ट शेकर्सजर्नल, नवम्बर 2009; www.saltshakers.org.au. बैवसाईट से लिया गया है; मूलपाठ में वापस जाएँ। पाठ करने के लिए लौटें.
  2. एरिक्सन, मिलॉर्ड., ख्रिष्टीय धर्मविज्ञान, बेकर बुक हाऊस, ग्रान्ड रेपिड्स, मिशीगन, पृ. 663, 1995. मूलपाठ में वापस जाएँ। पाठ करने के लिए लौटें.

संबंधित मीडिया